Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
एवं चास्य ज्ञातज्ञेयस्य पुंसो नामात्मा सुखदुःखानां न गम्य इति निश्चये जाते नात्मव्यतिरिक्ता
आधाराधेयदृष्टयो विद्यन्त इति निश्चये जाते कर्ता
भोक्तासर्वपदार्थव्यतिरिक्तोबालाग्रसहस्रभागोऽहमिति निश्चये जाते यत्किंचिदिदं तत्सर्वमहमेवेति
वा निश्चये जाते सर्वसत्त्वावभासकः सर्वगस्तिष्ठाम्येवाहमिति निश्चये जाते नाहं सुखदुःखानां गम्य
इति विगतज्वरतया चित्तवृत्तिर्लीलयैव तिष्ठते व्यवहारेषु ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार जिस पुरुष को ज्ञातव्य वस्तु का
ज्ञान हो चुका, उस पुरुष का आत्मा सुख और दुखों का विषय नहीं होता, ऐसा निश्चय होने पर, आत्मा
से अतिरिक्त आधार ओर आधेय दृष्टर्यो नहीं है, यह निश्चय होने पर, अकर्ता, अभोक्ता, सब पदार्थो
से अतिरिक्त बालके अग्रभाग के हजारवें हिस्से की तरह सूक्ष्म मैं हूँ एेसा निश्चय होने पर अथवा जो
कुछ यह सब है, वह सब मैं ही हूँ, यह निश्चय होने पर, मैं सब पदार्थो का प्रकाशक सर्वगामी स्थित ही
रहता हूँ, ऐसा निश्चय होने पर मैं सुख-दुःखों का विषय नहीं हूँ, यह निश्चय होने पर इष्ट प्राप्ति ओर
अनिष्ट परिहार के चिन्तारूपी ज्वर से रहित होने के कारण चित्तवृत्ति आत्मा में ही प्रारब्ध भोग के लिए
लीला प्रकट करती हुई व्यवहारो में स्थित रहती है