Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
एवं मनः सर्वकर्मणां सर्वेहितानां सर्वभावानां
सर्वलोकानां सर्वगतीनां बीजं तस्मिन्परिहृते सर्वकर्माणि परिहृतानि भवन्ति सर्वदुःखानि क्षीयन्ते सर्वकर्माणि लयमुपयान्ति ।
मानसेनापि कर्मणायत्कृतेनापि ज्ञो नाक्रम्यते न विवशीक्रियते न रञ्जनामुपैत्यव्यतिरिक्तात् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
सव कार्य, मन, बुद्धि उनके विषय ओर उनकी गतियो का मन ही बीज है, इसलिए मन का त्याग
होने पर सव संसार का त्याग सिद्ध हो जाता है, ऐसा कहते है।
इस प्रकार मन सब कर्मो का, सब चेष्टाओं का, सब पदार्थो का, सब लोकों का ओर सब अवस्थाओं
का बीज है। उसके चले जाने पर सब चेष्टाएँ चली जाती हे । सब दुःख नष्ट हो जाते हैँ । सब पाप-पुण्य
कर्म लीन हो जाते हैँ । मानसिक कर्म से और शारीरिक कर्म से भी ज्ञानी आक्रान्त नहीं होता, न विवश
होता है । उसमें शारीरिक या मानसिक कर्म का रंग नहीं चढ़ता, क्योकि परमार्थतः उससे अतिरिक्त
कुछ नहीं हे