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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

नानन्दं न निरानन्दं न चलं नाचलं स्थिरम् । न सन्नासन्न चैतेषां मध्यं ज्ञानिमनो विदुः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त मन की दशा का वर्णन करनेवाले श्लोक को उद्धृत करते है । विद्वान लोग ज्ञानियों के मन को न तो विषयानन्द मेँ आसक्त जानते हैं न स्वरूपानन्दशून्य, न चंचल, न पत्थर आदि के समान जड, न स्थिर, न सत्‌ न असत्‌ ओर न उक्त आनन्द, निरानन्द, चल, अचल, सत्‌, असत्‌ की सन्ध्यावस्थारूप ही जानते हैं, किन्तु उसे परिशेष एकमात्र भूमा आत्मसुखरूप जानते हैं