Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
आत्मविदां हि तन्मनः परमुपशममागतं
मृगतृष्णाजलमिव वर्षति जलदे हिमकण इव चण्डातपे विलीनं तुर्यदशामुपागतं स्थितम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
उन जीवों में आत्मज्ञानियों का वह मन वर्षा ऋतु में मृग तृष्णा के जल की तरह विनष्ट होकर एवं
तेज धूप में बर्फ के सदुश विलीन होकर तुरीय दशा को प्राप्त हो तुरीयारूप से स्थित रहता हे, यह ज्ञानी
में अज्ञानी की अपेक्षा विशिष्टता है