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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

तथाचायमत्रापरो दृष्टान्तः । अकुर्वन्नपि श्वभ्रपतनं श्तयासनगतोऽपि श्वभ्रपातवासनावासिते चेतसि श्वभ्रपतनदुःखमनुभवति । अपरस्तु कुर्वन्नपि श्वभ्रपतनं परममुपशममुपगतवति मनसि शय्यासनसुखमनुभवति । एवमनयोः शय्यासनश्वभ्रपातयोरेकः श्वभ्रपतनस्याकर्तापि कर्ता संपन्नो द्वितीयश्च श्वभ्रपतनस्य कर्ताप्यकर्ता संपन्नश्चित्तवशात्तस्माद्यच्चित्तं तन्मयो भवति पुरुष इति सिद्धान्तः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञानी के मन के दु्वासना दुःख में मग्न होने में स्वप्न दृष्टान्त है, एेसा कहकर उसका उपपादन करते हैं। अज्ञानियों के दुर्वासना दुःख में निमग्न होने का यह दूसरा दृष्टान्त हे । पुरुष गड्ढे मेँ न गिरता हो, शय्यारूप आसन पर स्थित हो, फिर भी उसका चित्त गर्तपतन की वासना से वासित हो, तो वह गड में गिरने के दुःख का अनुभव करता है, दूसरा पुरुष तो भले ही गड़ मेँ गिर रहा हो, मगर उसका मन परमशान्ति को प्राप्त हो चुका हो, तो वह शय्यारूप आसन के सुख का अनुभव करता है। इसी प्रकार इन शय्या और गर्तपतनों में एक पुरुष गर्तपतन का अकर्ता होता हुआ भी चित्तवश कर्ता बन गया और दूसरा पुरुष गर्तपात का कर्ता होता हुआ भी अकर्ता हो गया इसलिए जिस तरह का चित्त होता है, वैसा ही पुरुष हो जाता है, ऐसा सिद्धान्त है