Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवं स्थिते तु तज्ज्ञानां यदेतत्कर्तृत्वं दृश्यते सुखदुःखादिषु योगादिषु वा तदसन्नतु मूर्खाणाम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि तत्त्वज्ञानिर्यो की भी लौकिक और शास्त्रीय कर्मों में कर्तुता देखी जाती है।
वह अवश्य ही इष्ट ओर अनिष्ट के भोग को प्राप्त करायेगी, ऐसी अवस्था में अज्ञानी से तत्त्ववेत्ताओं में
क्या अन्तर है ? इस पर कहते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, सुख-दुख और भोगदेनेवाले कर्मो में या समाधि की
अभ्यास परिपाकरूप भूमिकाओं में तत्तवज्ञानियों का यह कर्म दिखाई देता हे, वह असत् है, मगर मूर्खो
का वह असत् नहीं है, यही तत्त्वज्ञानी ओर मूर्खो में अन्तर है
सर्ग सन्दर्भ
सैंतीसवाँ सर्ग समाप्त अड़तीसवाँ सर्ग असंग आत्मा को जो नहीं जानता, उसके मन के संग से कर्तृत्व तथा आत्मतत््वज्ञानी के अकर्ता ओर अभोक्ता होने से बन्ध के अभाव का वर्णन ।