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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

ज्ञाततत्त्वो हि शिथिलीभूतवासनः कुर्वन्नपि फलं नानुसंदधाति । अथच स्पन्दनमात्रं केवलं करोत्यसक्तबुद्धिः संप्राप्तमपि फलमात्मैवेदं सर्वमेव कर्मफलमनुभवत्यकुर्वन्नपि करोति मग्नमनाः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानी में जो विशेषता पहले कही गई थी, उसीका उपपादन करते हैं। जिस पुरुष को तत्त्व का परिज्ञान हो चुका, उसकी वासना शिथिल हो जाती हे । अतएव वह कर्म करता हुआ भी कर्म के फल की आकांक्षा नहीं करता । आसक्ति रहित वह केवल चेष्टामात्र ही करता हे । प्राप्त हुए कर्मफल को भी यह सब आत्मा ही हे, यों अनुभव करता हे । किन्तु भोग मे आसक्त मनवाला अज्ञानी कर्म न करता हुआ भी कर्म करता हे यानी कर्तृत्व से लिप्त होता हे