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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 27

31 verse-groups

  1. Verses 1–6यत्ताईसवाँ सर्ग दाम, व्याल और कट से पराजित होकर शरण में आये हुए देवताओं से ब्रह्माजी का च…
  2. Verse 7जैसे सिंह निबिड़ लतादि जालों से भरे हुए वन में दौड़कर गये हुए हरिणों को नहीं पाते हैं, वै…
  3. Verse 8देवताओं के न मिलने पर उस समय प्रसन्न हृदय हुए दाम, व्याल और कट पाताल के मध्य में स्थित अप…
  4. Verse 9तदुपरान्त दैत्यों से जीते गये अतएव उदास हुए वे देवता क्षणभर आराम कर अमित तेजस्वी ब्रह्माज…
  5. Verse 10देवताओं के, जिनकी मुखशोभा रुधिर से लाल हुई थी, सन्मुख जैसे सन्ध्या के समय लाल बादलों से ल…
  6. Verse 11उन देवताओं ने ब्रह्माजी को प्रणाम करके दाम, व्याल और कट की सृष्टिरूप शम्बरासुर का अनर्थका…
  7. Verse 12विचार करने में कुशल ब्रह्माजी ने वह सब वृत्तान्त सुनकर और विचार कर देव सेना से यह आश्वासन…
  8. Verses 13–14श्रीब्रह्माजी ने कहा : हे देव श्रेष्ठों, एक लाख वर्षों के बाद संग्राम के अधिपति श्रीहरि क…
  9. Verses 15–16युद्धाभ्यास के कारण इनके हृदय में अहंकार का चमत्कार ऐसे प्राप्त होगा, जैसे दर्पणों के अन्…
  10. Verse 17सुख-दुःख से रहित ये आज तो शम्बर के संकल्पानुसार वासनारहित हैं, इसलिए हे देवताओं, धैर्यपूर…
  11. Verse 18जो लोग वासनातंतु से बँघे हैं और आशारूपी पाश के वशीभूत हैं, वे रज्जु में बँधे हुए पक्षियों…
  12. Verse 19जिन धीर पुरुषों की वासनाएँ नष्ट हो गई हैं और जिनकी बुद्धि सभी जगह आसक्त नहीं है, वे न तो…
  13. Verse 20जिस पुरुष के भीतर वासनारूपी रज्जु की गाँठ बँधी है, वह महान क्यों न हो, बहुज्ञ ही क्यों न…
  14. Verse 21यह देहादि ही मैं हूँ, यह जय-पराजय, पूजा, जीवन आदि मेरा है इस प्रकार की कल्पनाओं से युक्त…
  15. Verse 22सबदुर्वासनाओं में से आत्मा की देहादितादात्म्य से परिच्छिन्नतारूप भ्रान्त वासना ही महामूर्…
  16. Verse 23जिसने अनन्त, अप्रमेय उस आत्मा की सीमा की कल्पना की, उसने अपने आत्मा से ही अपने आत्मा को व…
  17. Verse 24यदि तीनों जगतो मे आत्मा से अतिरिक्त कोई वस्तु हो, तो उसमे ग्राह्मरूप से ग्रहण करने के लिए…
  18. Verse 25ज्ञानी लोग आसक्ति को अनन्त दुःखों की खान कहते हैं तथा सर्वतः केवल अनासक्ति को सम्पूर्ण सु…
  19. Verse 26जब तक दाम, व्याल ओर कट इस संसार में आसक्ति रहित हैं, तब तक जैसे मच्छरों के लिए अग्नि अजेय…
  20. Verse 27देहादि के विनाश द्वारा अपने नाश की संभावना से दीनता को प्राप्त हुई, भीतर स्थित देहादि में…
  21. Verse 28जहाँ पर वासना रहती है वहीं पर वह पीनता (स्थूलता) को प्राप्त होती है, क्योकि धर्मी के रहने…
  22. Verse 29हे इन्द्र, जिस उपाय से दाम, व्याल ओर कट अपने अंतःकरण को यह देह आदि ही प्रसिद्ध मैं हूँ और…
  23. Verse 30मनुष्य की जो-जो विपत्तियाँ हैं और जो भाव ओर अभाव दशाएँ हैं, वे सब तृष्णारूपी करंज लता के…
  24. Verse 31वासनारूपी रस्सी से वेधा हुआ जो पुरुष आवागमन करता है, उस पुरुष की वृद्धि को प्राप्त हुई वह…
  25. Verses 32–33जैसे सिंह श्रृंखला से बाँधा जाता है वैसे ही अत्यन्त धीर, अत्यन्त बहुज्ञ, कुलीन ओर महान पु…
  26. Verse 34यह तृष्णा क्या है यह शरीररूपी वृक्ष पर बैठे हुए हृदयरूपी अपने निवास में जानेवाले चित्तरूप…
  27. Verse 35आयुधों के समूह की कोई आवश्यकता नहीं है एवं युद्ध में घूमने की भी कोई जरूरत नहीं है, आप के…
  28. Verse 36हे देवराज, शत्रु के हृदय में अक्षुभित धैर्य के रहने पर न शस्त्र जीत सकते हैं, न अस्त्र जी…
  29. Verses 37–38वासना का ग्रहण करेगे
  30. Verses 39–40तत्त्वज्ञो की अपेक्षा उनमें कौन सी कमी है 2 जिससे वे वासना ग्रहण करेंगे ? इस पर कहते है।…
  31. Verse 41जैसे जलाशय के अन्दर अत्यन्त चंचल तरह-तरह की लहरियों की अधिकता जलरूप से स्थित है, वैसे ही…