Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 27, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 27, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
दीनो वासनया लोकः कृतान्तेनापकृष्यते ।
रज्ज्वेव बालेन खगो विवशो भृशमुच्छवसन् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
यह तृष्णा क्या है यह शरीररूपी वृक्ष पर बैठे हुए
हृदयरूपी अपने निवास में जानेवाले चित्तरूपी पक्षी का जाल बुना हुआ है ॥ ३ ३॥ वासना से दीन लोगों
को यमराज इस प्रकार खींचता है जैसे बालक रज्जु से विवश और खूब श्वास छोड़ रहे पक्षी को खींचता
है