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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 27, Verses 1–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 27, verses 1–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 1-6

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । तस्मिंस्तदा वर्तमाने घोरे समरसंभ्रमे । देवासुरशरीरेषु गर्तेष्वभ्रोदरेष्विव ॥ १ ॥ वहत्स्वसृक्प्रवाहेषु गङ्गापूरेष्विवाम्बरात् । दाम्नि वेष्टितदेवौघकृतक्ष्वेडाघनारवे ॥ २ ॥ व्याले निजकराकृष्टिपिष्टसर्वसुरालये । कटे कठिनसंरम्भसङ्गरक्षपितामरे ॥ ३ ॥ ऐरावते क्षीणरवे पलायनपरायणे । प्रवृद्धे दानवानीके मध्याह्न इव भास्करे ॥ ४ ॥ पतिताङ्गव्यथार्तानि प्रस्रवद्रुधिराणि च । पयांसीवावसेतूनि देवसैन्यानि दुद्रुवुः ॥ ५ ॥ दामव्यालकटास्तानि चिरमन्तर्हितानि च । अनुजग्मुर्लसन्नादसिन्धनानीव पावकाः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

यत्ताईसवाँ सर्ग दाम, व्याल और कट से पराजित होकर शरण में आये हुए देवताओं से ब्रह्माजी का चिरकाल तक वासना वृद्धिरूप दैत्यवधोपाय कथन । उस घोर संग्राम के घटाटोप के चलने पर देवताओं तथा दैत्यों के शरीरों पर हुए व्रणों से जैसे आकाश से मेघों के मध्य में गंगा के प्रवाह बहते हैं वैसे ही खूनों के नाले बहने पर, दाम नामक दैत्य के देवताओं को वेष्टितकर सिंहनादरूपी महाध्वनि करने पर, व्याल के अपने हाथों द्वारा आकर्षण से सब देवताओं के निवासों को चूरचूर कर देने पर, कट के भीषण संग्राम में देवताओं को छिन्न-भिन्न करने पर, ऐरावत के मूक होकर भागने पर जैसे मध्याह में सूर्य की प्रखरता बढ़ जाती है, वैसे ही दानवों की सेना के वृद्धि को प्राप्त होने पर, कटे हुए अंगो की व्यथा से पीड़ित, रुधिर बहा रही देवताओं की सेनाएँ, जिसका बाँध टूट गया हो ऐसी जलराशि के समान भागी । दाम, व्याल ओर कट ने चिरकाल तक छिपी हुई देवसेनाओं का गर्जन-तर्जन के साथ ऐसे पीछा किया, जैसे अग्नि लकड़ियों का पीछा करती है