Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 27, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 27, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
इयन्मात्रपरिच्छिन्नो येनात्मा भव्यभावितः ।
स सर्वज्ञोऽपि सर्वत्र परां कृपणतां गतः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
सबदुर्वासनाओं में से आत्मा की देहादितादात्म्य से परिच्छिन्नतारूप भ्रान्त वासना ही महामूर्खता,
कृपणता और जन्म-मरण आदि की बीज होने से सबसे महा अनर्थ है, ऐसा कहते हैं।
जिसने यह आत्मा केवल देहमात्र परिच्छिन्न है, यह भावना की, वह सर्वज्ञ क्यो न हो, सर्वत्र ही
परम दीनता को प्राप्त होता हे