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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 27, Verse 41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 27, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

समविषममिदं जगत्समग्रं समुपनतं स्थिरतां स्ववासनान्तः । चलचललहरीभरो यथाब्धावत इह सैव चिकित्स्यतां प्रयाता ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे जलाशय के अन्दर अत्यन्त चंचल तरह-तरह की लहरियों की अधिकता जलरूप से स्थित है, वैसे ही अपनी वासना के मध्य में स्थित यह सम और विषम समस्त जगत प्रवाह से नित्यता को प्राप्त हुआ स्थित है, इसलिए एकमात्र स्ववासना की ही चिकित्सा करनी चाहिए