Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 62
26 verse-groups
- Verse 1अहंकारमयी पद्मयोनि की भावनारूपी चिति संकल्प के भेद से जगत् की रचना करती है । शंका - समष्…
- Verses 2–3इस प्रकार इस कल्पना की कहीं समाप्ति नहीं हे, यह अनन्त हे, अतएव यह भ्रान्ति ही है, वह भ्रा…
- Verse 4इस महामरूरूपी जगत् में जैसे मरूभूमि में तटवर्ती वृक्षों और लताओं से गिरे हुए फूलों की कत…
- Verse 5स्वप्न ओर इन्द्रजाल के नगर के तुल्य, ओपन्यासिक नगर ओर पर्वत के तुल्य, मनोरथ से कल्पित पुर…
- Verses 6–7तत्त्वज्ञान होने से सम्पूर्ण भ्रान्तियों के निवृत्त होने पर तत्त्वज्ञानियो की देहस्थिति क…
- Verse 8प्राणियों की अदृष्ट शक्ति को साथ लेकर ईश्वरसंकल्परूप महानियति ही जैसे सम्पूर्ण व्यवहारो क…
- Verse 9वह महानियति कबसे है और कैसे उसका रूप है ? इस पर कहते हैं। सृष्टि के आदि में (अग्नि) आदि क…
- Verses 10–12वही नियति परमात्मा से अभिन्न होने से सम्पूर्ण जगतां की स्थिति, प्रकाश-सामर्थ्य, विवेक, क्…
- Verse 13परमार्थ दृष्टि से ब्रह्मसत्ता के समान व्यवहार में वह भी अव्यभिचरित है, ऐसा कहते है । यद्य…
- Verse 14यह बात व्यावहारिक दृष्टि से कही गई है, तात्तिक दृष्टि से तो ब्रह्म, नियति और सर्ग शब्द के…
- Verse 15यदि कोई शंका करे कि ब्रह्म अचल है और सृष्टि चंचल है, इसलिए उन दोनों की एकता कैसे हो सकती…
- Verse 16यदि कोई कहे कि हिरण्यगर्भ ने इस नियति को कैसे जाना, जिससे कि उन्होने नियति के अनुसार ही स…
- Verse 17जैसे अंगी देह में अंगों को देखता है, वैसे ही हिरण्यगर्भ चित्स्वभाव होने के कारण नियति, आद…
- Verse 18दैव नाम से प्रख्यात यह (नियति) जो मोह से अभिभूत न होने से शुद्ध ईश्वरसंकल्परूप है, जगत्…
- Verse 19अमुक पदार्थ में इस प्रकार स्पन्द होना चाहिए, अमुक को भोक्ता पद प्राप्त होना चाहिए, इससे इ…
- Verse 20यही (महानियति ही) पुरुषचेष्टा, सम्पूर्णं तृण, पेड, पौधे, झाड़ियाँ आदि हे, यही सम्पूर्णं प…
- Verse 21इससे पुरुष की अदृष्टसम्बन्धिनी सत्ता (फलावश्यम्भावरूप स्थिति) लक्षित होती है । जब तक तीन…
- Verse 22मनुष्य को अपने पौरुष से ही नियति सत्ता ओर पुरुषअदृष्ट सम्बन्धिनी सत्ता दोनों सत्ताओं को ब…
- Verses 23–24बहुत क्या कहें, आपके शिष्यभाव से पूछने में मेरे द्वारा उपदिष्ट अर्थ के अनुष्ठान में भी नि…
- Verse 25यदि पहले भी कोई पुरुष निर्व्यापार ही रहेगा, तो बुद्धि नहीं होगी, बुद्धि से होनेवाले कार्य…
- Verse 26इसकी स्थिति ऐसी ही होनी चाहिए इस प्रकार की अवश्यभवितव्यतारूप नियति का रूद्र आदि की बुद्धि…
- Verse 27बुद्धिमान् पुरुष ऐसा निश्चय कर पौरूष का कभी त्याग न करे, क्योंकि नियति पौरुषरूप से ही नि…
- Verse 28यद्यपि नियति ओर पौरुष शब्द का एक ही अर्थ है, फिर भी उपाधिभेद से उनमें भेद व्यवहार होता है…
- Verses 29–30यदि कोई शंका करे कि जो पुरुष पौरुषशून्य होकर अजगरवृत्ति से रहे, उसको भी तो तृप्ति आदि फलल…
- Verses 31–32यदि निर्विकल्प समाधि में चित्त को शान्तिप्रदान करनेवाला प्राणनिरोध करता रहता है ओर उस प्र…
- Verse 33जो यह दुःखरहित नियति है, वह यदि ब्रह्मसत्ता की आभा में यानी स्फूर्ति में प्रयत्न से स्थिर…