Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
स्वप्नेन्द्रजालपुरवत्संकथेहापुराद्रिवत् ।
संकल्पवदसत्यैव भाति सर्गानुभूतिभूः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न ओर इन्द्रजाल के नगर के तुल्य, ओपन्यासिक नगर ओर पर्वत के तुल्य, मनोरथ से
कल्पित पुर और पर्वत के सदृश अथवा संकल्प के तुल्य असत्य ही यह सृष्टियों के अनुभव की
भूमि प्रतीत होती है