Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
परमाणुनिमेषाणां लक्षांशकलनास्वपि ।
जगत्कल्पसहस्राणि सत्यानीव विभान्त्यलम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
अहंकारमयी पद्मयोनि की भावनारूपी चिति संकल्प के भेद से जगत् की रचना करती है ।
शंका - समष्टि चिति में व्यष्टि चिति की अपेक्षा क्या विशेष है ?
समाधान - समष्टिचिति हम लोगों के समान बहिर्मुख नहीं हे, किन्तु अन्तर्मुख ही है,
अनन्त (विष्णु) भगवान् के निमेष के करोड़वें हिस्सेरूप काल में युगान्तरूप (बहनत्तर हजार
यानी सात करोड़ बीस लाख दिव्यवर्षरूप) अपनी आयु का अनुभव करती है, अहो माया क्या
नहीं कर सकती ! ॥३ ८॥
इकसठवाँ सर्ग समाप्त
बासठवाँ सर्ग
पहले जगत् की भ्रान्तिमात्रताका वर्णन तदुपरान्त जीवन्मुक्ति आदि की
सिद्धि के लिए महानियति का वर्णन ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, परमाणु के लाखवें हिस्से की कल्पनामें हजारों
ब्रह्माण्ड ओर निमेष के लाखवें हिस्से की कल्पना में हजारों कल्प दिखाई दे रहे हैं जो इस
ब्रह्माण्ड के समान ही सर्वथा सत्य-से प्रतीत होते हैं