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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verses 2–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 2, 3

संस्कृत श्लोक

तेष्वप्यन्तस्तथैवान्तः परमाणुकणं प्रति । भ्रान्तिरेवमनन्ताहो इयमित्यवभासते ॥ २ ॥ वहन्तीमाः पराः सत्ताः शान्ताः सर्गपरम्पराः । सलिलद्रवतेवान्तःस्फुटावर्तविवर्तिका ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार इस कल्पना की कहीं समाप्ति नहीं हे, यह अनन्त हे, अतएव यह भ्रान्ति ही है, वह भ्रान्ति ही जगद्रूप से भासित हो रही हे । वर्तमान, आनेवाली और अतीत सृष्टि-परम्पराएँ, जैसे जलराशि अपने अन्दर आवर्तो की परम्पराओं को धारण करती है तथा बहती है वैसे ही प्रातिभासिक सत्ता को धारण करती हैं ओर बहती हैं