Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verses 31–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
पौरुषैकात्मता श्रेयो मोक्षोऽत्यन्तमकर्तृता ।
आभ्यां तु सबलः पक्षो निर्दुःखैव महात्मनाम् ॥ ३१ ॥
नियतिर्ब्रह्मसत्ताभा तस्यां चेत्परिणम्यते ।
नूनं परमशुद्धाख्यं तत्प्राप्तैव परागतिः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि निर्विकल्प समाधि में चित्त को शान्तिप्रदान करनेवाला
प्राणनिरोध करता रहता है ओर उस प्रयत्न से साधु (तत्त्वज्ञानी) होकर यदि मुक्ति पा जाता
है, तो वह मुक्तिप्राप्ति भी प्राणनिरोध आदि पौरुष का ही फल है, इसलिए पौरुष के बिना
किसी भी फल की प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ ३ ०॥ इसलिए शास्त्रीय पौरुष में तत्पर होना श्रेयका
कारण होने से साधनरूप से श्रेयस्कर है और अत्यन्त अकर्मण्यतारूप मोक्ष फलरूप से श्रेय
है-इन फल और साधनरूप श्रेयो की अपेक्षा ज्ञानियों का पक्ष सबल है, यानी कार्यसहित
अविद्या के विनाश में समर्थ है, इस तरह दुःखरहित ही उनकी नियति है