Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verses 23–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 23,24
संस्कृत श्लोक
प्रष्टव्योऽहं त्वया राम दैवपौरुषनिर्णयः ।
मदुक्तं पौरुषं पाल्यं त्वयेति नियतिः स्थिता ॥ २३ ॥
भोजयिष्यति मां दैवमिति दैवपरायणः ।
यत्तिष्ठत्यक्रियो मौनं नियतेरेष निश्चयः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
बहुत क्या कहें, आपके शिष्यभाव से पूछने में मेरे द्वारा उपदिष्ट अर्थ के अनुष्ठान में भी
नियति ही कारण है, ऐसा कहते है ।
हे रामजी, आपको मुझसे पूछना चाहिए, इस विषय में भी दैवपौरुषनिर्णय ही हेतु हे ।
आपको मेरे द्वारा उक्त पौरुष का पालन करना चाहिए, यह भी नियति कृत ही है । जो मुझे दैव
खिलायेगा, इस प्रकार कोई मनुष्य देव का अवलम्बन कर पौरुष प्रयत्न को न कर अजगर की
वृत्ति धारण कर चुपचाप बैठा रहता है, वह भौ उसके अनुरूप पूर्व जन्म के कर्मो से उद्बोधित
नियति के कारण ही होता है, यह निश्चय है