Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
एतैर्नियत्यादिमहाविलासैब्रह्मैव विस्फूर्जति सर्वगात्मा ।
तृणादिवल्लीतरुगुल्मजालैः सत्तेव तोयस्य धरान्तरस्था ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जो यह
दुःखरहित नियति है, वह यदि ब्रह्मसत्ता की आभा में यानी स्फूर्ति में प्रयत्न से स्थिर की जाय,
तो वही परम शुद्ध नामक परमगति जिसे श्रुति “सा काष्टा सा परा गतिः" कहती है, प्राप्त ही हो
गई, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं हे ॥ ३ २॥ जैसे पृथ्वी के अन्दर स्थित जलकी सत्ता (द्रवता)
तृण, लता, वृक्ष, झाड़ियोंसे स्फुरित होती है, वैसे ही सर्वव्यापक ब्रह्म ही पूर्वोक्त नियति के
विलासो से, जो कभी नष्ट नहीं होते, स्फुरित होता है