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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verses 10–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, verses 10–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 10-12

संस्कृत श्लोक

महासत्तेति कथिता महाचितिरिति स्मृता । महाशक्तिरिति ख्याता महादृष्टिरिति स्थिता ॥ १० ॥ महाक्रियेति गदिता महोद्भव इति स्मृता । महास्पन्द इति प्रौढा महात्मैकतयोदिता ॥ ११ ॥ तृणानीव जगन्त्येवमिति दैत्याः सुरा इति । इति नागा इति नगा इत्याकल्पं कृतास्थितिः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

वही नियति परमात्मा से अभिन्न होने से सम्पूर्ण जगतां की स्थिति, प्रकाश-सामर्थ्य, विवेक, क्रिया, जन्म, अर्थक्रिया आदि की हेतु होने से क्रमशः महासत्ता, महाचिति, महाशक्ति, महादृष्टि, महाक्रिया, महोद्‌भव, महास्पन्द नामों से कही जाती है । सब जगत्‌ इस प्रकार तृणों के समान परिवर्तित होते हैं, क्रूर स्वभाववाले दैत्य, सौम्य आकारवाले देवता, विशालाकार पर्वत, सर्प आदि यों उसने कल्पपर्यन्त व्यवस्था कर रक्खी हे