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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । एकात्मैकतयैवं हि जाते सम्यग्विचारणात् । निर्विकल्पात्मविज्ञाने परे ज्ञानवतां वर ॥ ६ ॥ किमर्थमिह तिष्ठन्ति देहास्तत्त्वविदामपि । दैवेनैव समाक्रान्ता दैवमत्र च किं भवेत् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञान होने से सम्पूर्ण भ्रान्तियों के निवृत्त होने पर तत्त्वज्ञानियो की देहस्थिति का संभव नहीं है, ऐसी श्रीरासचन्द्रजी शंका करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ, पूर्वोक्त प्रकार के सम्यक्‌ विचार से एक अद्वितीय ब्रह्म के अभेद से निर्विकल्प आत्मज्ञान होने पर तत्त्वज्ञानियों के भी शरीर यहाँ पर किसलिए रहते हैं ? यदि कहिये दैव से आक्रान्त राजा बलि आदि के समान वे यहाँ रहते हैं, तो वह भी नहीं हो सकता, क्योकि तत्त्व-ज्ञानियों के ऊपर दैव की क्या दाल गल सकती है, क्योकि “तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशत आत्मा ह्येषां स भवति" (तत्त्वज्ञानी पुरुष का अकल्याण करने मेँ देवता समर्थ नहीं होते क्योकि वह देवताओं का आत्मभूत ही है) यह श्रुति तत्त्वज्ञानी के विषय में देवताओं की असामर्थ्य कहती है । कृपया बतलाइए कि उनके शरीरं की स्थिति में कौन प्रबल कारण है ?