Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 27
छल्बीसर्वो सर्ग समाप्त यत्ताईसवाँ सर्ग आश्चर्यमग्न लीला द्वारा फिर अपने पति के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त करना तथा सरस्वती देवी के उपदेश से बोध प्राप्त कर अपने पूर्व जन्मों का वर्णन करना ।
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- Verses 1–3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, उस पर्वतशिखर के ग्राम में उस ब्राह्मण के घर क…
- Verse 4लोक में प्रसिद्ध है कि दूसरे के संकल्पशरीर को दूसरा नहीं देख सकता, ऐसी अवस्था में संकल्पश…
- Verse 5जैसे स्वप्न और संकल्प मेँ पृथिवी आदि अधिभूत और नाडी, प्राण आदि से उपलक्षित शरीर के विना भ…
- Verse 6श्रीवसिष्ठजी प्रसगतः बीच में आई हुई शंका का समाधान कर प्रस्तुत कथा को कहते हैं। श्रीसरस्व…
- Verse 7लीला ने कहा : देवीजी, मेरे मृत पति का जीव जहाँ पर राज्य करता हे, वहाँ पर मुझे उन लोगों ने…
- Verses 8–9श्रीसरस्वलीजी ने कहा : वत्से, उस समय अभ्यास न होने के कारण तुम्हारा द्वैतज्ञान (प्रपंच सत…
- Verses 10–11हे सुन्दरी, जब अभ्यास न होने के कारण मैं लीला देह ही हूँ, ऐसा तुम्हारा दृढ़ संस्कार विनष्…
- Verse 12इस समय यदि तुम अपने पति के समीप में जाओ, तो उसके साथ तुम्हारा सम्पूर्ण व्यवहार पहले की ना…
- Verse 13यों प्रत्यक्ष दर्शन और उपदेश द्वारा सरस्वती देवीसे निर्दिष्ट अर्थ में लीला की असंभावना की…
- Verse 14अन्य भूमण्डलरूप उनका वह संसार भी यही मन्दिराकाश है, इसमें उनकी राजधानी के नगर में मैं उनक…
- Verse 15यहीं पर उस अन्तःपुर में मेरे पतिदेव राजा पद्म की मृत्यु हुई थी, इरी अन्तःपुराकाश में उस न…
- Verses 16–18वे पृथिवीतल में अनेक नगरों के अधिपति हो गये। पारमार्थिक ब्रह्म मेँ कल्पित मायिक चलन आदि व…
- Verses 19–20इस मण्डपाकाश में केवल आधुनिक पदार्थ ही नहीं है, किन्तु अतीत, आगामी सभी पदार्थ हैं । उन पद…
- Verse 21इस संसारमण्डप में तुम्हारा तीसरा पति वसुधाधिपति है, वह संसाररूपी महासागर में प्रविष्ट होक…
- Verses 22–23भोगरूपी बड़ी बड़ी लहरों की कल्पनाओं द्वारा विक्षिप्त हो गया है, इसी कारण उसकी बुद्धि मलिन…
- Verses 24–26अनेकानेक कठिनतर राजकार्यो को करता हुआ भी वह इस संसाररूपी भ्रम में सोया पड़ा है, जड होने क…
- Verse 27वत्से, वह अन्य ही संसार है, अन्य ही ब्रह्माण्डमण्डप है, वहाँ अन्य ही विविध व्यवहार होते ह…
- Verses 28–31इन संसारमण्डलो का पारमार्थिक स्वरूप तो मण्डप के मध्य में स्थित केवल चिदाकाश ही है, यह तुम…
- Verse 32भ्रान्ति से जगत् की प्रतीति होने पर भी वस्तुभरूत आत्मा में कभी भी कुछ भी नहीं हुआ ऐसा कह…
- Verse 33जैसे तालाब में लहरें हो होकर पुनः होती हैं, वैसे ही विचित्र आकारवाले काल, काल के अवयव दिन…
- Verses 34–56अवस्था देखकर, यद्यपि मैं हँसी थी तथापि उस मच्छर की दयनीय दशा के संस्कार से ही मैं मरी अतए…
- Verse 57स्थावरयपर्यन्त अधम योनियों में जन्म कहकर अब उत्तम जन्मो को भी कहती है। पहले मैंने गन्धमाद…
- Verses 58–59वहाँ पर भी दुःखप्रचुरता दर्शाती हैं। जैसे चाँदनी चन्द्रबिम्ब में लोट-पोट लेती है, वैसे ही…