Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verses 16–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, verses 16–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 16-18
संस्कृत श्लोक
संपन्नो वसुधापीठे नानाजनपदेश्वरः ।
सर्वार्जवजवीभाव इहैवैवं व्यवस्थितः ॥ १६ ॥
अस्मिन्नेव गृहाकाशे सर्वा ब्रह्माण्डभूमयः ।
स्थिताः समुद्गके मन्ये यथान्तः सर्षपोत्कराः ॥ १७ ॥
सदाऽदूरमहं मन्ये तद्भर्तुर्मम मण्डलम् ।
क्वचित्पार्श्वे स्थितमिह यथा पश्यामि तत्कुरु ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
वे पृथिवीतल में अनेक नगरों के अधिपति हो गये। पारमार्थिक
ब्रह्म मेँ कल्पित मायिक चलन आदि विकार इस प्रकार से इस मण्डपाकाश में ही व्यवस्थित
है । जैसे दोने के अन्दर सरसों की राशि रहती है, वैसे ही इसी गृहाकाश में सम्पूर्ण ब्रह्माण्डभूमियाँ
स्थित हैं, ऐसा मैं मानती हूँ । कहीं पास में स्थित अपने पति के मण्डल को सदा अतिनिकटवर्ती
समझती हूँ, उसे मैं यहाँ पर जैसे देखू, वेसा उपाय आप कीजिये