Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verses 22–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
भोगकल्लोलकलनाविकलो मलचेतनः ।
जाड्यजर्जरचिद्वृत्तिः संसाराम्भोधिकच्छपः ॥ २२ ॥
चित्राणि राजकार्याणि कुर्वन्नप्याकुलान्यपि ।
सुप्तः स्थितो जडतया न जागर्ति भवभ्रमे ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
भोगरूपी बड़ी बड़ी
लहरों की कल्पनाओं द्वारा विक्षिप्त हो गया है, इसी कारण उसकी बुद्धि मलिन हो गई हे । बुद्धि
की मलिनता से बुद्धि के अन्दर प्रतिबिम्बित उसकी चित्तवृत्ति भी प्रायः शिथिल हो गई हे, वह
संसाररूपी सागर का कछुआ बन गया है