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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verses 28–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, verses 28–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 28-31

संस्कृत श्लोक

आकाशमात्रमेतेषामिदं पश्य वपुः पुनः । मेरुमन्दरकोटीनां कोटयस्तेष्ववस्थिताः ॥ २८ ॥ परमाणौ परमाणौ सर्ववर्गानिरर्गलम् । महाचितेः स्फुरन्त्यर्करुचीव त्रसरेणवः ॥ २९ ॥ महारम्भगुरूण्येवमपि ब्रह्माण्डकानि हि । तुलया धानकामात्रमपि तानि भवन्ति नो ॥ ३० ॥ नानारत्नामलोद्द्योतो वनवद्भाति खे यथा । पृथ्व्यादिभूतरहिता जगच्चिद्भाति चिन्तया ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

इन संसारमण्डलो का पारमार्थिक स्वरूप तो मण्डप के मध्य में स्थित केवल चिदाकाश ही है, यह तुम पुनः पुनः अनुभव करो। इन संसारमण्डलों में एक नहीं कोटि कोटि मेरु ओर मन्दर पर्वत स्थित हैं। जैसे झरोखे आदि से घर के अन्दर गई हुई सूर्यकिरणों में त्रसरेणु स्फुरित होते हैँ, वैसे ही महाचैतन्य के परमाणु में विभिन्न विविध सृष्टियाँ निर्बाधरूप से स्फुरित होती हे । इस प्रकार (पूर्वदर्शित ब्रह्माण्ड के समान ही) वे ब्रह्माण्ड भी यद्यपि बड़े बड़े द्वीप, समुद्र, भुवन आदि से विशाल ही है, तथापि चिद्दुष्टिरूप तुला से उन्हें देखा जाय, तो वे वटबीजों के बराबर भी नहीं होते हैं। जैसे आकाश में भ्रमवश वन की नाई विविध प्रकार के रत्नों का निर्मल प्रकाश प्रतीत होता है, वैसे ही वस्तुतः पृथिवी आदि भेद से रहित ही चिति अविद्याजनित दृढ़ वासना से जगद्रूप प्रतीत होती है