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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

संकल्पस्वप्नयोर्येषां यत्र संकथनं मिथः । यथेहार्थक्रियां धत्ते तयोः सा संकथा तथा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

लोक में प्रसिद्ध है कि दूसरे के संकल्पशरीर को दूसरा नहीं देख सकता, ऐसी अवस्था में संकल्पशरीरधारिणी उन दोनों का संवाद कैसे हो सकता है ? श्रीरासचन्द्रजी की इस शका को उनकी आक्रति से भाँपकर स्वयं श्रीवसिष्ठजी समाधान करते हैं । लोक में जिनका देवता के प्रसाद आदि से उषा और अनिरुद्ध की नाई समान ही परस्परसंवादी संकल्प या स्वप्न हुआ, उनका उस संकल्प ओर स्वप्न में परस्पर संवाद जैसे संवाद के अनन्तर होनेवाली क्रियारूप में परिणत होता है, वैसे ही लीला और ज्ञप्तिदेवी का संवाद भी हुआ