Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verses 19–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 19, 20
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
भूतलारुन्धतिसुते भर्तारस्तव संप्रति ।
त्रयो नामाथवाभूवन्बहवः शतसंमताः ॥ १९ ॥
नेदीयसां त्रयाणां तु द्विजस्ते भस्मतां गतः ।
राजा माल्यान्तरगतः संस्थितोऽन्तःपुरे शवः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
इस मण्डपाकाश में केवल आधुनिक पदार्थ ही नहीं है, किन्तु अतीत, आगामी सभी
पदार्थ हैं । उन पदार्थो में तुम्हारे अनेक जन्मों के अनेक पतियों के शरीर है, सबका दर्शन
एक साथ होना तो असम्भव है, उनमें से तुम्हें कौन-सा दिखलाऊँ, इस अभिप्राय से
देवीजी ने कहा ।
श्रीदेवीजी ने कहा : हे पुत्रि, हे भूतल की अरुन्धती, इस समय तुम्हारे तीन पति हुए
अथवा सैकड़ों पति हुए । अत्यन्त संनिकट तीन पतियों में से वसिष्ठ ब्राह्मणरूप पति तो
जलकर भस्म हो गया है ओर पद्मराजारूप पति फूलमालाओं की राशि से ठका हुआ शवरूप
से अन्तःपुर में स्थित है