Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
कचति ज्ञप्तिरेवेदं जगदित्यादि नात्मनि ।
नतु पृथ्व्यादि संपन्नं सर्गादावेव किंचन ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
भ्रान्ति से जगत् की प्रतीति होने पर भी वस्तुभरूत आत्मा में कभी भी कुछ भी नहीं हुआ
ऐसा कहती है ।
चित् का ही भ्रमवश इस जगत् आदिरूप से विकास होता है । अतः सृष्टि के आदि में ही
पृथिवी आदि कुछ नहीं हुआ, अतः उससे आत्मा में कभी कुछ भी हास, वृद्धि आदि विकार
नहीं हुआ