Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verses 58–59
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, verses 58–59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 58,59
संस्कृत श्लोक
कर्णिकर्पूरपूरेषु तल्पेषु व्यसनातुरा ।
चिरं विलुलितास्मीन्दुबिम्बेष्विव शशिप्रभा ॥ ५८ ॥
योनिष्वनेकविधदुःखशतान्वितासु भ्रान्तं मयोन्नमनसन्नमनाकुलात्मा ।
संसारदीर्घसरितश्चलया लहर्या दुर्वारवातहरिणीसरणक्रमेण ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर भी दुःखप्रचुरता दर्शाती हैं।
जैसे चाँदनी चन्द्रबिम्ब में लोट-पोट लेती है, वैसे ही उक्त विद्याधर कुमारों के वियोगजनित
दुःख से पीड़ित होकर मैं कपूर के चूर्ण से भरपूर शय्याओं मेँ चिरकाल तक लेटी रही । तराजू
के पलड़े की नाईं ऊर्ध्वगति (ऊपर उठना) और अधोगति (नीचे गिरना) से व्याकुलचित्त एवं
संसाररूपी विशाल नदी की चंचल तरंगरूप मैंने वातहरिणी के (वातप्रेमीनामक एक प्रकार की
हरिण जाति के) दुर्वारगमनक्रम से (>>) भाँति-भाँति के सैकड़ों दुःखों से युक्त अनेक योनियों
में भ्रमण किया