Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 27, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
संसारमण्डलानीह तानि पार्श्वे स्थितान्यपि ।
दूरं योजनकोटीनां कोटयस्तेष्विहान्तरम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
वत्से, वह अन्य ही संसार है, अन्य ही
ब्रह्माण्डमण्डप है, वहाँ अन्य ही विविध व्यवहार होते हैं ।। २६॥ यद्यपि वे पूर्वोक्त संसारमण्डल
इस मण्डपाकाश में अधिष्ठानभूत चिद्दष्टि से पास में ही स्थित हैं, तथापि सांसारिक दृष्टि से
उन में कोटि-कोटि योजन दूरी का अन्तर (व्यवधान) है