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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 105

एक सौ चौथा सर्ग समाप्त एक सो पाँचवाँ सर्ग मोहरहित प्रकृतिस्थ राजा के प्रति सभासदां का मोह हेतु के विषय में प्रश्न के अनन्तर राजा की उक्ति के आरम्भ का वर्णन |

21 verse-groups

  1. Verse 1वसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, जैसे वर्षाकाल के जल से मुक्त हुआ उत्तम कमल विकसित हो जा…
  2. Verses 2–3जैसे भूकम्प के समय विशाल वन ओर शिखरो के अग्रभागो से युक्त पर्वत अपने शरीर को कँपाता है वै…
  3. Verse 4जैसे प्रलयकाल में क्षुब्ध हुए मेरु को कुलपर्वत अपने तटों से सम्हालते हैं वैसे ही गिर रहे…
  4. Verse 5मन्त्री आदि सन्मुखवर्ती पुरूषों द्वारा सम्हाले जा रहे व्याकुलबुद्धि उस राजा ने चन्द्रमा क…
  5. Verse 6जैसे डूब रहे कमल के कोश के अन्दर स्थित भ्रमर मन्द-मन्द ध्वनि करता है वैसे ही उस राजा ने य…
  6. Verse 7तदनन्तर जैसे राहू से ग्रस्त सूर्य से नलिनी, जिससे भ्रमरियाँ शब्द कर रही हों, आदर के साथ आ…
  7. Verse 8तदनन्तर जैसे प्रलयकाल में भयभीत श्री मार्कण्डेय मुनिजी से देवता पूछते है हैं वैसे ही सन्म…
  8. Verse 9महाराज, आपकी ऐसी हालत होने पर हम अत्यन्त व्याकुल हैं । यद्यपि मन अभेद्य है तथापि भ्रम उसक…
  9. Verse 10आपातरमणीय ओर परिणाम में विरस भोगो में जैसे पामर जनोंका मन ललचाता है वैसे ही किन विकल्पों…
  10. Verse 11उदार वृत्तान्तवाली विद्वत्चर्चाओं के विषय में परिशीलन करने से शीतल अतएव निर्मल आपका मन भय…
  11. Verse 12तुच्छ विषयों में आसक्त अतएव विषय के छिन्न-भिन्न होने पर छिन्न-भिन्न सा और विषय से जर्जरित…
  12. Verse 13देहाभिमान से विवेकरहित अवस्थाओं में इस मन की स्त्री, पुत्र आदि के विषय में एक धारा से जो…
  13. Verses 14–15आपका मन तो अतुच्छ (अविनाशी) वस्तु का अवलम्बन करता हे । धीर, प्रबुद्ध ओर गुणों से मनोहर है…
  14. Verse 16जिसको नित्यविवेक प्राप्त है, विवेक से परिष्कृत उसके चित्त को क्या छिन्न भिन्नता ओर जर्जरत…
  15. Verse 17इस प्रकार अपने आत्मीयलोगों से अनुकूल वाणियों द्वारा आश्वासित राजा के मुख को कान्ति ने ऐसे…
  16. Verse 18वह राजा, जिसके लोचन प्रफुल्लित थे, मनोहर मुख से युक्त होकर ऐसे सुशोभित हुआ जैसे कि हेमन्त…
  17. Verses 19–20जैसे डूबने के लिए तैयार चन्द्रमा आकाश में राहू को देखकर भय से ओर आश्चर्य से खिन्नमुखवाला…
  18. Verses 21–23अरे बिना विचारे काम करनेवाले एेन्द्रजालिक, मायारूपी जाल से जटावाले तुमने यह क्या किया ? ज…
  19. Verses 24–26बुद्धिमान का भी मन चाहे उसने महा ज्ञान का अभ्यास कितना ही क्यों न कर लिया हो, देह के रहते…
  20. Verse 27ऐसा कहकर जब सब (तित पहले किसी समय बलि ने इन्द्र को असहाय अवस्था मेँ पा लिया । वह अपने बल…
  21. Verse 28आगे कही जानेवाली कथा के उपोद्घातरूप से पहले सर्वजनप्रसिद्ध भूमि के अन्तर्गत अपने स्वदेश क…