Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verses 19–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
अथातिसंभ्रमाश्चर्यखिन्नास्मृतिमुखो बभौ ।
आसन्नमृत्युरालोक्य राहुमिन्दुरिवाम्बरे ॥ १९ ॥
ऐन्द्रजालिकमालोक्य प्रोवाचाथ हसन्निव ।
बभुं हिंसात्मकं दृष्ट्वा सर्परूपीव तक्षकः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
डूबने के लिए तैयार चन्द्रमा आकाश में राहू को देखकर भय से ओर आश्चर्य से खिन्नमुखवाला
होता है वैसे ही राजा देन्द्रजालिक को देखकर अतिभय ओर आश्चर्य से खिन्न ओर पूर्वापर
सब वृत्तान्तो के अनुसन्धान से युक्त मुखवाला होकर सुशोभित हुआ | तदनन्तर देन्द्रजालिक
को देखकर हँसते हुए राजा उससे जैसे सर्प को मार डालनेवाले नेवले को देखकर छोटे साँप के
वेष में छिपा हुआ नागराज उससे कहता है वैसे ही कहा