Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verses 21–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, verses 21–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 21-23
संस्कृत श्लोक
जाल्म जालजटालेन किमेतद्भवता कृतम् ।
येनास्पन्दप्रसन्नोऽब्धिः क्षणादेत्य प्रसन्नताम् ॥ २१ ॥
चित्रं चित्रा हि देवस्य पदार्थशतशक्तयः ।
सुशक्तमपि मे चित्तं याभिर्मोहे निवेशितम् ॥ २२ ॥
क्व वयं लोकपर्यायकृतान्तपदवेदिनः ।
क्व मनोमोहदायिन्यो वितताः प्रकृतापदः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
अरे बिना विचारे काम
करनेवाले एेन्द्रजालिक, मायारूपी जाल से जटावाले तुमने यह क्या किया ? जिससे निश्चल
ओर प्रसन्न सागर के सदुश मेरा मन एक क्षण में अप्रसन्नता को प्राप्त होता है । भगवान् के
सैंकड़ों पदार्थो की शक्तियाँ विचित्र हैं, जिन्होंने अत्यन्त शक्तिशाली मेरे चित्त को मोह में
डाल दिया है, यह कम आश्चर्य नहीं हे । लोकप्रसिद्ध सम्पूर्ण व्यवहारो के सिद्धान्तरहस्य के
ज्ञाता हम कहाँ और मन को मोह में डालनेवाली इस समय अनुभूत ये विस्तृत आपत्तियाँ
कहाँ ?