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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verses 14–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

अतुच्छालम्बनं धीरं प्रबुद्धं गुणहारि च । तवापि हि मनश्चित्रमालूनमिव लक्ष्यते ॥ १४ ॥ अनभ्यस्तविवेकं हि देशकालवशानुगम् । मन्त्रौषधिवशं याति मनो नोदारवृत्तिमत् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

आपका मन तो अतुच्छ (अविनाशी) वस्तु का अवलम्बन करता हे । धीर, प्रबुद्ध ओर गुणों से मनोहर है फिर भी वह छिन्न -भिन्न सा दिखाई देता है, यह बड़े आश्चर्य की बात हे । जिस मन ने विवेक का अभ्यास नहीं किया ओर जो देश-काल का वशवर्ती है, वह मन्त्र ओर ओषधि का वशीभूत होता है । उदार वृत्तिवाला मन मणि, मन्त्र ओर ओषधि के वश में नहीं होता