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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

नित्यमात्तविवेकस्य कथमालूनशीर्णता । धुनोति विततं चेतो वात्येव विबुधाचलम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसको नित्यविवेक प्राप्त है, विवेक से परिष्कृत उसके चित्त को क्या छिन्न भिन्नता ओर जर्जरता कम्पित कर सकती है ? क्या आँधी कभी भी मेरु को कपा सकती है ? अर्थात्‌ जैसे आँधी का मेरुपर्वत को कँपाना सम्भव नहीं है, वैसे ही विवेकी पुरुष के विवेक से विशुद्ध हृदय को विशीर्णता कम्पित नहीं कर सकती