Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
मुहूर्तद्वितयेनाथ बोधमाप महीपतिः ।
प्रावृषेण्याम्बुनिर्मुक्तमम्भोरुहमिवोत्तमम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
वसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, जैसे वर्षाकाल के जल से मुक्त हुआ उत्तम कमल
विकसित हो जाता हे वैसे ही दो मुहुर्त में राजा बोध को प्राप्त हो गया
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ चौथा सर्ग समाप्त एक सो पाँचवाँ सर्ग मोहरहित प्रकृतिस्थ राजा के प्रति सभासदां का मोह हेतु के विषय में प्रश्न के अनन्तर राजा की उक्ति के आरम्भ का वर्णन |