Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
इति जातानुगीर्णस्य भूपतेः कान्तिराननम् ।
भूषयामास शीतांशुं मासान्त इव पूर्णता ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार अपने
आत्मीयलोगों से अनुकूल वाणियों द्वारा आश्वासित राजा के मुख को कान्ति ने ऐसे विभूषित
किया जैसे पौर्णमासी के दिन पूर्णता चन्द्रमा को विभूषित करती है