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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verses 24–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, verses 24–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 24-26

संस्कृत श्लोक

अप्यभ्यस्तमहाज्ञानं मनस्तिष्ठति देहके । कदाचिन्मोहमादत्ते क्षणं मतिमतामपि ॥ २४ ॥ इदमाश्चर्यमाख्यानं श्रूयतां रे सभासदः । मम शाम्बरिकेणेह यन्मुहूर्तं प्रदर्शितम् ॥ २५ ॥ दृष्टवानहमेतस्मिन्बह्वीः कार्यदशाश्चलाः । मुहूर्तं प्रार्थितोऽध्वस्तशक्रसृष्टिरिवालजः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

बुद्धिमान का भी मन चाहे उसने महा ज्ञान का अभ्यास कितना ही क्यों न कर लिया हो, देह के रहते कभी क्षण भर के लिए स्वप्नरूपी इन्द्रजालं का मोह धारण करता हे । हे सभासदां, इस आश्चर्यकारी आख्यान को आप लोग सुनिये, जो ऐन्द्रजालिक ने यहाँ पर एक मुहूर्त में मुझे दर्शाया हे । मैंने इसमें एक मुहूर्त मे बहुत सी चंचल कार्य दशाओं को देखा, जैसे किं बलि द्वारा प्रसादित ब्रह्मा ने, जिन्होंने इन्द्र की सृष्टि को विनष्ट नहीं किया था, एक मुहूर्त इन्द्र की सृष्टि का माया कोतुक देखा था (=)