Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
तुच्छालम्बनमालूनविशीर्णं लोकवृत्तिषु ।
मनो मोहमुपादत्ते न महत्त्वविजृम्भितम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
तुच्छ विषयों में आसक्त अतएव विषय के छिन्न-भिन्न होने पर छिन्न-भिन्न सा और
विषय से जर्जरित सा मन लोकव्यवहारो में मोह को प्राप्त होता है, पर विवेक से परिष्कृत मन
कदापि मोह को प्राप्त नहीं होता