Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 105, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 105 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
सातत्येन हि यैवास्य मनसो वृत्तिरुत्थिता ।
शरीरमदमत्तासु तामेवैतद्विधावति ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
देहाभिमान से विवेकरहित अवस्थाओं में इस मन की
स्त्री, पुत्र आदि के विषय में एक धारा से जो वृत्ति उदित हुई, उसी वृत्ति की ओर यह दौड़ता
है