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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 104

एक सौ तीनवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौथा सर्ग लवणाख्यान में पहले देश, राजा और सभा का वर्णन तथा सभा में एेन्द्रजालिक के घोड़े का दर्शन और राजा के विस्मय का वर्णन |

25 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरघुवंशमणे, यह जगद्रूप इन्द्रजाल जिस प्रकार चित्त के अधीन है यान…
  2. Verses 2–4इस भूमण्डल में अनेक वनों से व्याप्त, धन-जन से सुसमृद्ध "उत्तरापाण्डव* नाम का एक विशाल देश…
  3. Verses 5–10उसके गाँवों के चारों ओर करौदे के फूल, झाड़ियाँ और फूलों के गुच्छों से भरे हुए जंगल थे । ऊ…
  4. Verse 11उसके केलों के मण्डपों में किन्नर और गर्न्धव गाते थे । मन्द-मन्द वायु के शब्दों से वह बड़ा…
  5. Verses 12–13उक्त उत्तरापाण्डवनामक देश में हरिश्चन्द्र कुल में उत्पन्न हुआ परमधार्मिक लवण नामक राजा था…
  6. Verse 14उसके प्रधान प्रधान शत्रुजन तलवारों से टुकड़े-टुकड़े करके काटे गये अतएव निःशेष हो गये थे ।…
  7. Verses 15–17धार्मिक पुरुषों के रक्षक उदार कर्मो से भरे हुए जिसके चरित का श्री हरि के चरित की नाई चिरक…
  8. Verse 18हे रामचन्द्रजी, जिसका उदार चमत्कार अन्य राजाओं के तुल्य नहीं था यानी उनसे कहीं अधिक बढा-च…
  9. Verses 19–20कुटिलता तो वह जानता ही न था, अविनीतता तो उसने देखी भी न थी । जेसे ब्रह्मा रुद्राक्षमाला क…
  10. Verses 21–26जैसे चन्द्रमा आकाश में उदित होते हैं, वैसे ही जब उक्त राजा सभागृह में सिंहासन पर विराजमान…
  11. Verse 27जैसे पर्वत के समीप के छोटे पर्वत में स्थित फलों से लदा हुआ वृक्ष जिसकी ऊपर की भूमि भली मा…
  12. Verse 28जैसे छायादार, ऊँचे तनेवाले, फूलों से सुशोभित और फलों से लदे हुए वृक्ष के आगे बन्दर प्रवेश…
  13. Verses 29–30जैसे भँवरा सुगन्धयुक्त कमल से मधुर स्वर से बोलता है वैसे ही अत्यन्त चपल और धनलोलुप उसने ऊ…
  14. Verses 31–33यह कहकर उसने भ्रम उत्पन्न करनेवाले मोरपंख के मोरछल को घुमाया जो कि नानाविध रचनाओं के कारण…
  15. Verses 34–35इसी समय एक अश्वपालक जैसे मेघ सितारों से पूर्ण आकाश में प्रविष्ट होता है वैसे ही सभा में प…
  16. Verses 36–37हे राजन्‌, उच्चैःश्रवा के तुल्य इस उत्तम अश्व को आप देखिये । वेग से उड़ने में यह मूर्तिमा…
  17. Verse 38जैसे मेघनिर्घोष के शान्त होने पर चातक मेच से कहते हैं वैसे ही उसके ऐसा कहने पर एेन्द्रजाल…
  18. Verses 39–40हे प्रभो, जैसे सूर्य अपने प्रताप से अधिक शोभायुक्त पृथिवी पर विचरण करते हैं वैसे ही इस सु…
  19. Verses 41–42देखने के अनन्तर चित्र में लिखित आकार के तुल्य आकारवाला राजा निनिमिष दृष्टि से घोड़े को दे…
  20. Verse 43दो मुहूर्त तक राजा आत्मा में ध्यानासक्त के समान ऐसे स्थित हुआ जैसे कि वीतराग और बाह्यदृष्…
  21. Verse 44अपने पराक्रम से बलवानों पर जिसने विजय पायी थी, ऐसे उस राजा को किसी ने नहीं जगाया क्योकि व…
  22. Verse 45जिनमें चन्द्रमा की किरणें स्तम्भित हों, ऐसी रात्रियों की नाई केवल वहाँ पर चँवर इलानेवाली…
  23. Verse 46जैसे मिट्टी से बने हुए निश्चल केसर और दलवाले कमल शोभित होते है वैसे ही विस्मयपूर्ण निश्चल…
  24. Verses 47–48जैसे वर्षा ऋतु की समाप्ति में आकाश में मेघ का गर्जन शान्त हो जाता है वैसे ही सभामण्डप में…
  25. Verse 49राजा के आँख बन्द करके बैठने पर अति आश्चर्य से निरुत्साह हुई भय और मोह से दुःखी सभामण्डप क…