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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 19–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 19,20

संस्कृत श्लोक

जिह्मतां यो न जानाति न दृष्टा येन धृष्णुता । उदारता येन धृता ब्रह्मणेवाक्षमालिका ॥ १९ ॥ दिनाष्टभागमाकाशमागते दिवसाधिपे । स कदाचित्सभास्थाने सिंहासनगतोऽभवत् ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

कुटिलता तो वह जानता ही न था, अविनीतता तो उसने देखी भी न थी । जेसे ब्रह्मा रुद्राक्षमाला को सदा धारण करते हैं, वैसे ही उसने निरन्तर उदारता धारण की थी । किसी समय, जब सूर्य आकाश में उस स्थान पर पहुँच गये थे जहाँ पहुँचने पर चार दण्ड दिन चढ़ता है, वह सभागृह में सिंहासन पर विराजमान हुआ