Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 41–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, verses 41–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 41,42
संस्कृत श्लोक
अथानिमेषया दृष्ट्या राजा चित्रोपमाकृतिः ।
बभूवालोकयन्नश्वं लिपिकर्मार्पितोपमः ॥ ४१ ॥
क्षणमालोक्य पीठस्थस्तस्थौ संस्थगितेक्षणः ।
दृष्ट्याऽऽक्षुब्धः समुद्रोऽद्रिमीनकैः करवो यथा ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
देखने के अनन्तर चित्र में
लिखित आकार के तुल्य आकारवाला राजा निनिमिष दृष्टि से घोड़े को देखता हुआ भीत में
लिखे हुए चित्र के तुल्य निश्चल हो गया । जैसे समुद्र पीने के लिए उद्यत हुए अगस्त्य की दृष्टि
से क्षुब्ध होकर, अपने भीतर स्थित पर्वत रूपी मीनो के साथ भय से स्तम्भित होकर स्थित
हुआ था वैसे ही राजा क्षण भर देखकर सिंहासन में ही आँख बन्द करके स्थित हो
गया