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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 31–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, verses 31–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

इत्युक्त्वा पिच्छिका तेन भ्रामिता भ्रमदायिनी । नानाविरचनाबीजं मायेव परमात्मनः ॥ ३१ ॥ तां ददर्श महीपालस्तेजोरेणुविराजिताम् । शक्रः सुरविमानस्थः स्वकार्मुकलतामिव ॥ ३२ ॥ सभां सैन्धवसामन्तो विवेशास्मिन्क्षणे तदा । तारापरिकरापूर्णां व्योमवीथीमिवाम्बुदः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

यह कहकर उसने भ्रम उत्पन्न करनेवाले मोरपंख के मोरछल को घुमाया जो कि नानाविध रचनाओं के कारण परमात्मा की माया के तुल्य था । जैसे देवविमान में स्थित इन्द्र अपनी धनुषलता को (इन्द्रधनुष को) देखता है वैसे ही राजा ने तेज के कणो से विराजित उस मोरछल को देखा