Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 39–40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, verses 39–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 39 ,40
संस्कृत श्लोक
सदश्वमेनमारुह्य भुवनं विहर प्रभो ।
स्वप्रतापाहितानल्पशोभामुर्वीं रविर्यथा ॥ ३९ ॥
अश्वमालोकयामास तेनोक्त इति पार्थिवः ।
निर्घातस्तनितं मेघं मयूर इव सूत्करः ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रभो, जैसे सूर्य अपने प्रताप से अधिक शोभायुक्त
पृथिवी पर विचरण करते हैं वैसे ही इस सुन्दर घोडे पर सवार होकर आप सम्पूर्णं भुवन में
विचरण कीजिए । उसके ऐसा कहने पर जैसे मयूर गर्दन उठाकर घोर शब्दवाले मेच को देखता
है वैसे ही राजा ने गर्दन ऊँची करके उस घोडे को देखा