Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 2–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, verses 2–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 2-4
संस्कृत श्लोक
अस्त्यस्मिन्वसुधापीठे नानावनसमाकुलः ।
उत्तरापाण्डवो नाम स्फीतो जनपदो महान् ॥ २ ॥
नीरन्ध्रघनगम्भीरवनविश्रान्ततापसः ।
विद्याधरीकृतलतादोलोपवनपत्तनः ॥ ३ ॥
वातोद्धूताञ्जकिञ्जल्कपुञ्जपिञ्जरपर्वतः ।
लसत्कुसुमसंभारवनमालावतंसकः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस भूमण्डल में अनेक वनों से व्याप्त,
धन-जन से सुसमृद्ध "उत्तरापाण्डव* नाम का एक विशाल देश हे । उसके अत्यन्त घने ओर
गहन वनों में तपस्वी शान्त चित्त से निवास करते थे अर्थात् बाघ, चोर आदि का कहीं कोई
उपद्रव न था । उसके नगरों के उपवनों में विद्याधारियाँ लताओं के हिंडोले बनाकर झूलती
थी । उस देश के सब पर्वत वायु से उड़ाई गई कमल के केसर राशि से पीले पड़ गये थे ।
शोभायमान फूलों की राशि से पूर्ण वनश्रेणी ही उसका अवतंस (शिरोभूषण यानी सिर पर
तिरछी माला) था