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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 5–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, verses 5–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 5-10

संस्कृत श्लोक

करञ्जमञ्जरीकुञ्जगुच्छपर्यन्तजङ्गलः । खर्जूरान्तरितग्रामो घुंघुमध्वनिताम्बरः ॥ ५ ॥ एकपिङ्गशिलाश्रेणीशालिकेदारपिङ्गलः । नीलकण्ठारवोद्दामवनजङ्गलमण्डितः ॥ ६ ॥ सारसारवसंरम्भरणत्कनककाननः । तमालपाटलीनीलगिरिग्रामककुण्डलः ॥ ७ ॥ विचित्रविहगव्यूहविरावकृतकाकलिः । नदीपरिसरोन्निद्रपारिभद्रद्रुमारुणः ॥ ८ ॥ गायत्कलमकेदारदारिकाहृतमन्मथः । पुष्पफलचलद्वातव्याधूतकुसुमाम्बुदः ॥ ९ ॥ दरीगृहविनिष्क्रान्तसिद्धचारणबन्दिकम् । स्वर्गादिव समानीय लावण्यमभिनिर्मितः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

उसके गाँवों के चारों ओर करौदे के फूल, झाड़ियाँ और फूलों के गुच्छों से भरे हुए जंगल थे । ऊँचे-ऊँचे खजूर के पेड़ों से उसके बहुत से गोव आच्छन्न थे। लोगों के धुँ, घँ शब्द से आकाश गूजता था। उत्तम पीले रंग की मणियों की श्रेणी के सदृश पके हुए धानोके खेतों से सारा देश पीला दिखता था । नीलकण्ठ के शब्द से खूब गजे हुए वन और जंगलों से वह देश सुशोभित था, सारसा के शब्द के वेग से उसके फूलों के केसर से कनकमयसे कानन मुखरित थे । तमाल ओर पाटल के वृक्षों से विचित्र प्रकार के नीले पर्वतो के छोटे-छोटे गाँव उसके कुण्डल थे । रंग-बिरंग के पक्षियों के कलरव से उसमें बड़ी मधुर ओर अव्यक्त ध्वनि हो रही थी। नदी के किनारे पर खूब खिले हुए मीठी नीव के वृक्षों से वह सारा देश लाल था धान के खेतों में गा रही युवतियों से उसमें मन्मथ का आवाहन हो रहा था| फूल और फलों में, उनके शिथिल वृन्त (डंठी) को गिराने के लिए, बह रहे वायु से उसमें फूलरूपी मेघ कँपाये जा रहे थे । मेरु पर्वत की गुफाओं से जिसके सिद्ध, चारण और बन्दी निकल गये थे, ऐसे लावण्य को स्वर्ग से लाकर मानों वह देश बनाया गया था