Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 36–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 36,37
संस्कृत श्लोक
इदमुच्चैःश्रवःप्रख्यं हयरत्नं महीपते ।
जवोडुयनशीलेन मूर्तिमानिव मारुतः ॥ ३६ ॥
अश्वोऽयमस्मत्प्रभुणा प्रभो संप्रहितस्त्वयि ।
राजते हि पदार्थश्रीर्महतामर्पणाच्छुभा ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, उच्चैःश्रवा के तुल्य इस उत्तम अश्व को आप
देखिये । वेग से उड़ने में यह मूर्तिमान् वायु की तरह है । हे प्रभो, हमारे स्वामी ने इसे आपके
समीप भेजा है, क्योंकि उत्तम पदार्थ महान् पुरुषों के समर्पण से अधिक सुशोभित होता
है