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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 47–48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, verses 47–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 47,48

संस्कृत श्लोक

प्रशशाम सभास्थाने जनकोलाहलः शनैः । प्रशान्तप्रावृषि व्योमन्याम्भोदमिव गर्जितम् ॥ ४७ ॥ संदेहसागरे मग्ना जग्मुश्चिन्तां सुमन्त्रिणः । विषीदति गदापाणावसुराजाविवामराः ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे वर्षा ऋतु की समाप्ति में आकाश में मेघ का गर्जन शान्त हो जाता है वैसे ही सभामण्डप में धीरे-धीरे कोलाहल शान्त हो गया । जैसे कि भगवान्‌ विष्णु के असुरयुद्ध में पीड़ित होने पर देवताओं को चिन्ता होती है वैसे ही सन्देहसमुद्र में डूबे हुए बुद्धिमान्‌ मन्त्री परम चिन्ता को प्राप्त हुए