Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, Verses 34–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 104, verses 34–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 104 · श्लोक 34,35
संस्कृत श्लोक
तं चैवानुजगामाश्वः सौम्यः परमवेगवान् ।
देवलोकोन्मुखं तुष्टं शक्रमुच्चैःश्रवा इव ॥ ३४ ॥
स तमश्वमुपादाय पार्थिवं समुवाच ह ।
सोच्चैःश्रवा इव क्षीरसागरो मरुतां पतिम् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी समय एक अश्वपालक जैसे मेघ सितारों से पूर्ण आकाश में प्रविष्ट
होता है वैसे ही सभा में प्रविष्ट हुआ ॥ ३ ३॥ अत्यन्त वेगवान् सौम्य घोडा उसके पीछे ऐसे चला
जैसे स्वर्ग की ओर जा रहे अतिप्रसन्न वदन इन्द्र के पीछे उच्चैःश्रवा नामक घोडा जाता हे ।
जैसे क्षीरसागर ने उच्चैःश्रवा से युक्त होकर इन्द्र से कहा था वैसे ही उसने उस घोडे को
लाकर राजा से कहा